मुगल काल से स्थापित प्राचीन रामेश्वर शिवलिंग से जुड़ी भक्तों की अटूट आस्था,,

सावन के सोमवार को रामेश्वर महादेव की पूजा अचर्ना करने को जुटती भक्तों की भीड़

शिवभक्ति की अलौकिक अनुभूति का केंद्र बना ऐतिहासिक मंदिर

आशुतोष शर्मा / प्रिंस द्विवेदी

Jalaun news today । श्रावण मास के सोमवारों का विशेष महत्व यूं ही नहीं है। यह सिर्फ श्रद्धा और आस्था का पर्व नहीं, बल्कि शिवभक्ति की उस परंपरा का प्रतीक है जो वैदिक युग से चली आ रही है। इसी परंपरा का जीवंत उदाहरण है माधौगढ़ कस्बे में स्थित रामेश्वर महादेव मंदिर, जो न केवल प्राचीनता की मिसाल है बल्कि शिवभक्तों की आस्था का अटूट केंद्र भी है। इस मंदिर की स्थापना रामपुरा क्षेत्र के करनखेरा के राजा कर्ण सिंह द्वारा की गई थी, जो भगवान शिव के परम भक्त थे। इतिहास बताता है कि मुगल शासक औरंगजेब की सेना ने मंदिर को ध्वस्त करने की कोशिश की थी, लेकिन शिवलिंग को क्षति नहीं पहुँचा सके। हालांकि मंदिर के कुछ हिस्सों को तोड़ा गया, जिनके अवशेष आज भी मंदिर परिसर में मौजूद हैं और इतिहास की गवाही देते हैं।
स्थानीय बुजुर्गों और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह शिवलिंग पाँच प्रमुख ज्योतिलिंर्गों में से एक माना जाता है। मंदिर में भगवान शंकर, माता पार्वती और भगवान गणेश एक साथ विराजमान हैं। खास बात यह है कि यहां स्थित शिवलिंग पीली रेत से निर्मित है, जो अमरत्व और दिव्यता का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि इसका नाम रामेश्वर रखा गया दृ ठीक उसी प्रकार जैसे भगवान राम ने रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना की थी।वैसे तो वर्ष भर श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना के लिए आते हैं, लेकिन सावन के सोमवार और महाशिवरात्रि के दिन यहां विशेष भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से रामेश्वर महादेव एवं भूरेश्वर का जलाभिषेक करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।स्थापना काल से लेकर अब तक मंदिर की सेवा का कार्य स्थानीय महंतों और पुजारियों द्वारा किया जाता रहा है। मंदिर की धामिर्क परंपराएं आज भी पूरी श्रद्धा और नियमों के अनुसार निभाई जाती हैं।

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