सांसद पानीदार होते तो बुंदेलखंड राज्य बन गया होता: प्रवीण पाण्डेय बुंदेलखंडी
संसद में बुंदेलखंड राज्य की आवाज उठाने की मांग
फतेहपुर। बुंदेलखंड राष्ट्र समिति के महत्वपूर्ण कोर कमेटी की बैठक नगर में सम्पन्न हुईl
बुंदेलखंड राज्य की स्थापना की मांग को लेकर चल रहे संघर्ष को नया मोड़ देते हुए बुंदेलखंड राष्ट्र समिति 30 नवंबर को सांसद के आवास का घेराव करेगी। समिति का कहना है कि अब समय आ गया है कि क्षेत्र के सांसद संसद में बुंदेलखंड राज्य पर स्पष्ट और मजबूत आवाज उठाएँ।
समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रवीण पाण्डेय बुंदेलखंडी ने कहा कि यदि जनप्रतिनिधि पानीदार और ईमानदार होते, तो बुंदेलखंड राज्य कब का बन चुका होता। उन्होंने आरोप लगाया कि क्षेत्र के सांसद–विधायक जनता के मुद्दों के बजाय अपने पुत्रों को सांसद–विधायक बनाने की राजनीति कर रहे हैं।
बुंदेलखंड राज्य की माँग 1955 में राज्य पुनर्गठन आयोग के सामने रखी गई थी। इसके बाद 1997 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने विधानसभा में समर्थन भी दिया था।
2008 में यूपी विधानसभा ने चार नए राज्यों—जिसमें बुंदेलखंड भी शामिल था—का प्रस्ताव केंद्र को भेजा, लेकिन उस पर कोई कार्यवाही नहीं हुई।
2011 में राहुल गांधी और 2014 में उमा भारती ने भी समर्थन दिया, पर घोषणा अमल में नहीं उतर सकी।
देश में तीन बड़े क्षेत्रीय आंदोलनों—झारखंड, उत्तराखंड और तेलंगाना—को निर्णायक नेतृत्व और जनएकता के कारण सफलता मिली।
लेकिन पाण्डेय के अनुसार, बुंदेलखंड में नेतृत्व की कमी और राजनीतिक चुप्पी ने आंदोलन को लगातार कमजोर किया।
बुंदेलखंड राष्ट्र समिति ने पिछले एक दशक में जनजागरण के अनोखे प्रयास किए हैं।
प्रवीण पाण्डेय बुंदेलखंडी के नेतृत्व में प्रधानमंत्री को अब तक दो हजार से अधिक खून से लिखे खत भेजे जा चुके हैं।
2025 में गुरु पूर्णिमा से जन्माष्टमी के बीच एक लाख खत और रक्षाबंधन पर एक लाख राखियाँ प्रधानमंत्री को भेजी गईं।
“गाँव–गाँव, पाँव–पाँव” अभियान, पदयात्राओं और विद्यालयों में जागरूकता कार्यक्रमों ने आंदोलन को लगातार जीवित रखा है।
पाण्डेय ने कहा कि पानी अब आग बन चुका है।
सूखा और बाढ़ की दोहरी मार, बेरोजगारी, पलायन, किसानों की आत्महत्याएँ और संसाधनों की लूट—ये सभी साबित करते हैं कि बुंदेलखंड को अब अलग राज्य के रूप में विकसित करना समय की माँग बन चुका है।
राष्ट्रीय संगठन महामंत्री यज्ञेश गुप्ता का कहना है कि 30 नवंबर का घेराव आंदोलन को नई दिशा देगा।
यदि सांसद जनता की आवाज़ बनें, तो बुंदेलखंड भी झारखंड, उत्तराखंड और तेलंगाना की तरह भारत के मानचित्र पर एक स्वतंत्र राज्य के रूप में उभर सकता है।





