उत्तर प्रदेश 2027 : योगी के नौ साल का हिसाब, विपक्ष का विकल्प और मतदाता की कसौटी

अमिताभ नीलम ( वरिष्ठ पत्रकार लखनऊ)
उत्तर प्रदेश 2027 की ओर बढ़ रहा है। चुनावी सरगर्मी अभी पूरी तरह तेज नहीं हुई है, लेकिन सियासी सवाल सामने आने लगे हैं—योगी आदित्यनाथ के सामने विकल्प कौन है? मगर क्या यही सही सवाल है?
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य के मतदाता के सामने असली सवाल व्यक्ति बनाम व्यक्ति का नहीं, काम बनाम विकल्प का होना चाहिए। यानी सवाल यह हो कि योगी सरकार के नौ वर्षों के कामकाज के सामने विपक्ष के पास बेहतर क्या है? और यदि वह बेहतर विकल्प होने का दावा करता है तो उसकी नीति, नेतृत्व और शासन का मॉडल क्या है?
2017 में सत्ता संभालने के बाद योगी सरकार ने प्रदेश की राजनीति की प्राथमिकताओं को काफी हद तक बदला। कानून-व्यवस्था, एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, निवेश, औद्योगिक विकास, डिजिटल शासन, धार्मिक-सांस्कृतिक पर्यटन और ‘वन डिस्ट्रिक्ट-वन प्रोडक्ट’ उसकी पहचान बने। प्रदेश की अर्थव्यवस्था के आकार में भी इस दौरान उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
सड़क और कनेक्टिविटी के क्षेत्र में बदलाव सबसे दिखाई देता है। पूर्वांचल, बुंदेलखंड और गंगा एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाओं ने प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने की नई संभावनाएं पैदा की हैं। एयरपोर्ट नेटवर्क का विस्तार और औद्योगिक कॉरिडोर भी उत्तर प्रदेश को निवेश के नक्शे पर अधिक महत्वपूर्ण बनाने की कोशिश हैं।
लेकिन यहीं सरकार की असली परीक्षा शुरू होती है। निवेश प्रस्तावों का कितना हिस्सा जमीन पर उतरा? कितने नए रोजगार बने? क्या विकास का लाभ छोटे किसान, व्यापारी, कारीगर और युवा तक पहुंचा? क्या सरकारी स्कूल और अस्पताल भी उसी गति से बदले जिस गति से एक्सप्रेसवे बने?
कानून-व्यवस्था योगी सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक पहचान रही है। अपराध और माफिया नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई ने सरकार को अलग राजनीतिक ब्रांड दिया। लेकिन मजबूत कानून-व्यवस्था का अर्थ केवल कठोर कार्रवाई नहीं है। कानून का शासन तभी मजबूत माना जाएगा जब कार्रवाई के साथ विधिक प्रक्रिया, न्यायिक निगरानी और संस्थागत जवाबदेही भी सुनिश्चित हो।
इन सवालों से सरकार बच नहीं सकती। लेकिन विपक्ष भी नहीं।
समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी सहित विपक्षी दलों के सामने 2027 में सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वे सिर्फ ‘योगी हटाओ’ के नारे से आगे बढ़ें। उन्हें बताना होगा कि कानून-व्यवस्था पर उनकी नीति क्या होगी? निवेश और उद्योग कैसे बढ़ेंगे? रोजगार कहां से आएगा? किसान, शिक्षा, स्वास्थ्य और शहरी सुविधाओं के लिए उनका ठोस रोडमैप क्या है?
सत्ता विरोध अपने आप में विकल्प नहीं होता।
2022 में भाजपा ने 403 सदस्यीय विधानसभा में 255 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी। लेकिन पिछला जनादेश भविष्य की गारंटी नहीं होता। नौ साल की सत्ता के बाद सरकार को उपलब्धियों के साथ स्थानीय असंतोष, बढ़ती अपेक्षाओं और सत्ता-विरोध की संभावनाओं का भी सामना करना होगा।
2027 का युवा मतदाता इस चुनाव की दिशा बदल सकता है। उसके लिए रोजगार, कौशल, शिक्षा, आय और बेहतर जीवन-स्तर जातीय समीकरणों और राजनीतिक नारों से अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं। इसलिए सरकार को बताना होगा कि विकास की चमक रोजगार और आय में कितनी बदली। विपक्ष को बताना होगा कि वह इससे बेहतर क्या करेगा।
योगी सरकार का मूल्यांकन न अंधी प्रशंसा से होना चाहिए, न पूर्वाग्रहपूर्ण विरोध से। उसी तरह विपक्ष की हर आलोचना को इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता कि जनता सत्ता से नाराज हो सकती है।
लोकतंत्र में सत्ता बदलने का अधिकार जनता के पास है, लेकिन सत्ता बदलने का कारण और विकल्प—दोनों होने चाहिए।
2027 में उत्तर प्रदेश के मतदाता के सामने सबसे बड़ा सवाल शायद यही होगा—योगी से बेहतर कौन?
अगर बेहतर विकल्प है तो उसकी नीति, नेतृत्व और रिकॉर्ड क्या है? और अगर नहीं है तो केवल सत्ता-विरोध के नाम पर बदलाव क्यों?
न योगी को स्थायी छूट मिलनी चाहिए, न अखिलेश को, न मायावती को, न किसी और को। जनता को हर पांच साल बाद पूछना चाहिए—आपने क्या किया, क्या नहीं किया और अगले पांच साल में बेहतर क्या करेंगे?
आखिर 2027 का चुनाव केवल यह तय न करे कि कौन जीतेगा, बल्कि यह भी तय करे कि कौन बेहतर है।
क्योंकि लोकतंत्र में मतदाता किसी दल की जागीर नहीं होता—वह हर चुनाव में काम, नीति, नेतृत्व और विकल्प को अपनी कसौटी पर परखता है।





