लोकसभा में पेश हुआ one nation, one election , विधेयक,,केंद्रीय मंत्री ने कही यह बात,सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दर्ज कराया विरोध

One Nation One Election Bill । एक बड़ी खबर देश की संसद में चल रहे शीतकालीन सत्र में पेश हुए एक बिल को लेकर मीडिया के प्रकाश में आई है मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार आज लोकसभा में केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने एक देश एक चुनाव पेश कर दिया है। इसके साथ ही केंद्रीय मंत्री श्री मेघवाल ने केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़े कानूनों में संशोधन के बिल भी पेश किए। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट्स के अनुसार संसद में एक देश एक चुनाव का बिल पेश होने के अवसर पर केंद्रीय मंत्री ने कहा कि आजादी के बाद से चुनाव आयोग लोकसभा और विधानसभाओं के 400 से ज्यादा चुनाव करा चुका है अब हम एक देश एक चुनाव का कॉन्सेप्ट लाने जा रहे हैं एक हाई लेवल कमिटी इसका रोड मैप बन चुकी है इससे प्रशासनिक क्षमता बढ़ेगी चुनाव संबंधी खर्च में कमी आएगी और नीतिगत निरंतर को बढ़ावा मिलेगा। लोकसभा में पेश हुए इस विधेयक का जहां केंद्रीय मंत्रियों ने इसके फायदे बताये है तो वही विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया है।

केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद पटेल ने कहा

लोकसभा में पेश हुए एक देश एक चुनाव के सम्बंध में मीडिया से कहा कि एक राष्ट्र एक चुनाव देश के प्रगति के लिए है। पूरे देश में 5 साल में एक बार चुनाव होगा पहले भी ऐसा ही था 1952 से पहले बहुत दशकों तक चुनाव ऐसे ही होते थे। कांग्रेस ने अनुच्छेद 350 का उपयोग करके विधानसभा को भंग किया इस पर बात करें लेकिन सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना ठीक नहीं है।

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कही यह बात

एक देश एक चुनाव विधेयक पर सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कड़ा विरोध किया है। उन्होंने अपने X हेंडिल पर कहा कि

प्रिय देश-प्रदेशवासियों, पत्रकारों, सच्चे लोकतंत्र के सभी सच्चे पक्षधरों से अपील।

‘एक देश-एक चुनाव’ के संदर्भ में जन-जागरण के लिए आपसे कुछ ज़रूरी बातें साझा कर रहा हूँ। इन सब बिंदुओं को ध्यान से पढ़िएगा क्योंकि इनका बहुत गहरा संबंध हमारे देश, प्रदेश, समाज, परिवार और हर एक व्यक्ति के वर्तमान और  भविष्य से है।

– लोकतांत्रिक संदर्भों में ‘एक’ शब्द ही अलोकतांत्रिक है। लोकतंत्र बहुलता का पक्षधर होता है। ‘एक’ की भावना में दूसरे के लिए स्थान नहीं होता। जिससे सामाजिक सहनशीलता का हनन होता है। व्यक्तिगत स्तर पर ‘एक’ का भाव, अहंकार को जन्म देता है और सत्ता को तानाशाही बना देता है।

– ‘एक देश-एक चुनाव’ का फ़ैसला सच्चे लोकतंत्र के लिए घातक साबित होगा। ये देश के संघीय ढांचे पर भी एक बड़ी चोट करेगा। इससे क्षेत्रीय मुद्दों का महत्व ख़त्म हो जाएगा और जनता उन बड़े दिखावटी मुद्दों के मायाजाल मे फंसकर रह जाएगी, जिन तक उनकी पहुँच ही नहीं है।

– हमारे देश में जब राज्य बनाए गये तो ये माना गया कि एक तरह की भौगोलिक, भाषाई व उप सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के क्षेत्रों को ‘राज्य’ की एक इकाई के रूप में चिन्हित किया जाए। इसके पीछे की सोच ये थी कि ऐसे क्षेत्रों की समस्याएं और अपेक्षाएं एक सी होती हैं, इसीलिए इन्हें एक मानकर नीचे-से-ऊपर की ओर ग्राम, विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा के स्तर तक जन प्रतिनिधि बनाएं जाएं। इसके मूल में स्थानीय से लेकर क्षेत्रीय सरोकार सबसे ऊपर थे। ‘एक देश-एक चुनाव’ का विचार इस लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही पलटने का षड्यंत्र है।

– एक तरह से ये संविधान को ख़त्म करने का एक और षड्यंत्र भी है।

– इससे राज्यों का महत्व भी घटेगा और राज्यसभा का भी। कल को ये भाजपावाले राज्यसभा को भी भंग करने की माँग करेंगे और अपनी तानाशाही लाने के लिए नया नारा देंगे ‘एक देश-एक सभा’ । जबकि सच्चाई ये है कि हमारे यहाँ राज्य को मूल मानते हुए ही ‘राज्यसभा’ की निरंतरता का सांविधानिक प्रावधान है। लोकसभा तो पाँच वर्ष तक की समयावधि के लिए होती है।

– ऐसा होने से लोकतंत्र की जगह एकतंत्रीय व्यवस्था जन्म लेगी, जिससे देश तानाशाही की ओर जाएगा। दिखावटी चुनाव केवल सत्ता पाने का ज़रिया बनकर रह जाएगा।

– अगर भाजपाइयों को  लगता है कि ‘ONE NATION, ONE ELECTION’ अच्छी बात है तो फिर देर किस बात की, केंद्र व सभी राज्यों की सरकारें भंग करके तुरंत चुनाव कराइए। दरअसल ये भी ‘नारी शक्ति वंदन’ की तरह एक जुमला ही है।

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