व्यापारियों के आवाहन पर उरई का बाजार रहा बंद, पुलिस रही चैकन्नी
बेटी दर्द से तड़पती रही और अस्पताल पर्चा बनवाने में उलझा रहा
ब्यूरो रिपोर्ट

Orai jalaun news today ।जालौन जनपद में बीती रात्रि राजकीय मेडिकल कालेज में बेटी का उपचार कराने पहुंचे व्यापारी नेता बृजकिशोर गुप्ता के परिवार के साथ जिस तरह से वहां के चिकित्सकों व सुरक्षा कर्मियों ने मारपीट की घटना को अंजाम दिया और फिर उल्टा पीड़ित परिवार के विरुद्ध सदर कोतवाली में मुकदमा दर्ज होने की जानकारी मिलते ही बुधवार को लोगों में आक्रोश व्याप्त हो गया इसी के चलते व्यापारियों द्वारा बाजार बंदी का ऐलान किया जो पूरी तरह से सफल रहा। इस दौरान व्यापारियों ने स्टेशन रोड से घंटाघर तक विरोध मार्च निकालकर धरना सभा का आयोजन किया। इस दौरान पुलिस के विरुद्ध मुर्दाबाद के नारे भी जमकर लगाये गये। मौके पर पहुंचे एसपी ने व्यापारियों को एफआईआर दर्ज कराने का आश्वासन दिया लेकिन समाचार लिखे जाने तक मुकदमा दर्ज नहीं हुआ था।

बताया जाता है कि जालौन के उरई स्थित राजकीय मेडिकल कॉलेज उरई में सोमवार देर रात जो कुछ हुआ, उसने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीनता और जूनियर डॉक्टरों की कथित गुंडागर्दी पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। एक घायल बच्ची इलाज के लिए मेडिकल कालेज लाई गई थी, लेकिन आरोप है कि डॉक्टरों और स्टाफ ने प्राथमिक उपचार शुरू करने के बजाय पहले पर्चा बनवाने की औपचारिकता पूरी करने पर जोर दिया। इस बीच युवती दर्द से कराहती रही और परिजन इलाज की गुहार लगाते रहे। पीड़ित परिवार के अनुसार, 15 से 20 मिनट तक केवल पर्चा बनाने की प्रक्रिया चलती रही। जब परिजनों ने तत्काल इलाज शुरू करने की मांग की तो अस्पताल स्टाफ और जूनियर डॉक्टर नाराज हो गए। मामला इतना बढ़ा कि अस्पताल परिसर देखते ही देखते रणक्षेत्र में बदल गया था।
घायल बहन के लिए बोला भाई और टूट पड़े डॉक्टर
घटना के केंद्र में शहर के व्यापारी बृजकिशोर गुप्ता का परिवार बताया जा रहा है। परिवार अपनी घायल बेटी को लेकर मेडिकल कॉलेज पहुंचा था। परिजनों का आरोप है कि जब युवती के भाई ने डॉक्टरों से कहा कि “पहले इलाज शुरू कर दीजिए”, तभी कहासुनी शुरू हो गई। आरोप है कि कुछ जूनियर डॉक्टरों और अस्पताल स्टाफ ने युवक को घेर लिया और उसके साथ बेरहमी से मारपीट की। जिसका इलाज कानपुर चल रहा है। इतना ही नहीं, परिवार का दावा है कि विधायक से बात कराने के दौरान मोबाइल फोन भी तोड़ दिया गया। अस्पताल के भीतर चीख-पुकार मच गई, जबकि बाहर मुख्य गेट पर ताला डाल दिया गया। देर रात तक मेडिकल कॉलेज परिसर तनाव और अफरा-तफरी का केंद्र बना रहा।
सीसीटीवी ने खोली ‘सफेद झूठ’ की पोल
घटना के बाद जूनियर डॉक्टर डॉ. आराध्य नगायच की ओर से एक तहरीर दी गई, जिसके आधार पर पीड़ित पक्ष पर ही एफआईआर दर्ज कर ली गई। लेकिन इसके बाद सामने आए सीसीटीवी फुटेज ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया। डॉक्टर की ओर से दिए गए पत्र में दावा किया गया कि तीमारदारों ने डॉक्टर को घसीटा और सिर पर कुर्सी मारी। मगर वायरल ब्ब्ज्ट फुटेज में कथित तौर पर यह दिखाई दे रहा है कि बहस के दौरान पहले डॉक्टर पक्ष की ओर से हाथापाई शुरू हुई। फुटेज में युवक को घेरकर पीटने और उसके सिर पर कुर्सी मारने के भी आरोप लगाए जा रहे हैं। अब सवाल उठ रहा है कि अगर सीसीटीवी कैमरे न होते, तो क्या एक घायल परिवार को ही अपराधी बनाकर जेल भेज दिया जाएगा
“भगवान नहीं, गुंडागर्दी?” शहर में उबाल
इस घटना ने पूरे उरई शहर में भारी आक्रोश पैदा कर दिया। मंगलवार सुबह से घंटाघर क्षेत्र में व्यापारियों ने बाजार बंद कर धरना शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर डॉक्टरों के खिलाफ अभियान शुरू हो गया।

धरने में व्यापारी संगठनों के साथ जिला के लगभग सभी भाजपा नेता भी शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि अगर डॉक्टर मरीजों और तीमारदारों के साथ इसी तरह मारपीट करेंगे, तो आम आदमी इलाज कराने कहाँ जाएगा? लोगों का आरोप है कि मेडिकल कॉलेज में मरीजों और उनके परिजनों के साथ बदसलूकी और मारपीट की घटनाएं पहले भी होती रही हैं, लेकिन हर बार मामला दबा दिया जाता है। “आज व्यापारी परिवार के साथ घटना हुई है, इसलिए मामला सामने आ गया। लेकिन गरीब और आम लोगों की आवाज कौन सुनता है?” यह सवाल धरना स्थल पर बार-बार सुनाई देता रहा।
धरनास्थल पहुंच एसपी ने खुद संभाला मोर्चा

धरनास्थल पर पहुंचे एसपी विनय कुमार ने व्यापारी पक्ष को आश्वासन दिया कि उनकी तहरीर पर भी मुकदमा दर्ज किया जाएगा। एसपी विनय कुमार सिंह के आश्वासन के बाद व्यापारियों ने धरना प्रदर्शन बंद किया ।
सबसे बड़ा सवाल
जिस अस्पताल में घायल इंसान राहत की उम्मीद लेकर पहुंचता है, अगर वहीं उसे अपमान, हिंसा और डर मिले तो फिर जनता किस पर भरोसा करे? डॉक्टरों को समाज भगवान का दर्जा देता है, क्योंकि वे जिंदगी बचाने का काम करते हैं। लेकिन अगर वही डॉक्टर इलाज से पहले अहंकार दिखाने लगें और मरीजों के परिजनों पर हाथ उठाने लगें, तो यह केवल एक घटना नहीं बल्कि पूरे चिकित्सा तंत्र के लिए खतरे की घंटी है।
उरई मेडिकल कॉलेज की यह घटना अब सिर्फ एक मारपीट का मामला नहीं रह गई है, बल्कि यह सवाल बन चुकी है। क्या सरकारी अस्पतालों में इंसानियत अब फाइलों और पर्चों के नीचे दब चुकी है?




