(संजय सिंह)
लखनऊ। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में अखिलेश यादव के जब तीसरी बार निर्विरोध अध्यक्ष चुने जाने का ऐलान किया गया, तो उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी कि चन्द दिनों बाद अपने पिता और पार्टी संस्थापक व संरक्षक मुलायम सिंह यादव के बारे में उन्हें ट्वीट कर ये जानकारी देनी होगी—’मेरे आदरणीय पिता जी और सबके नेता जी नहीं रहे।’
मुलायम की छत्रछाया में रिश्ते की डोर से बंधा रहा सैफई कुनबा
यूं तो अखिलेश यादव 2017 से पार्टी की कमान संभाल रहे हैं। इसके बाद से ही हर फैसला वह स्वयं करते आये हैं। लेकिन, पार्टी के भीतर सक्रिय नहीं होने के बावजूद मुलायम सिंह यादव का अपने परिवार, नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच वही कद और सम्मान बना रहा। कई मौकों पर परिवार के बीच सियासी मतभेद के बावजूद मुलायम की छत्रछाया में सैफई कुनबा रिश्ते की डोर से बंधा रहा। यहां तक की शिवपाल यादव के अपनी सियासी राह अलग करने के बावजूद कभी ‘नेताजी’ मुलायम के खिलाफ किसी ने कभी कोई आवाज नहीं उठायी। ये मुलायम के कद का ही असर रहा कि वरिष्ठ नेताओं ने भी अखिलेश यादव को वही सम्मान दिया जो वह नेताजी को देते आये थे। अब शोक की घड़ी में भी सभी अखिलेश यादव के साथ खड़े हैं। लेकिन, भावनात्मक रिश्ते की डोर के आगे सपा और अखिलेश यादव की असली सियासी चुनौती का सफर अब शुरू होगा।
पिता की छत्रछाया में बढ़ता गया अखिलेश का सियासी सफर
अखिलेश यादव भले ही सियासत में नये नहीं हों और समय के साथ उनमें सियासी परिपक्वता भी देखने को मिली हो। लेकिन वर्ष 2000 में कन्नौज लोकसभा सीट से पहली बार 26 साल की उम्र में लोकसभा पहुंचने और उसके बाद 2004, 2009 में भी सांसद निर्वाचित होने से लेकर 2012 में समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलने के बाद जिस तरह से उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, वह मुलायम की छत्रछाया में ही सम्भव हो पाया। अब नेताजी के न रहने के बाद उनके सामने वरिष्ठ नेताओं का विश्वास बनाये रखने और पार्टी को मजबूत करने की बड़ी चुनौती है।
इन चुनौतियों का करना होगा सामना
उत्तर प्रदेश में आने वाले दिनों में निकाय चुनाव को लेकर सियासी पारा गरम होगा। मैनपुरी लोकसभा सीट पर उपचुनाव भी कराया जाएगा। इसके अलावा 2024 में लोकसभा के सियासी महासमर को लेकर सभी दलों की निगाहें पहले से ही उत्तर प्रदेश पर टिकी हुई हैं। सर्वाधिक 80 लोकसभा सीट होने के कारण यूपी से ही दिल्ली की राह प्रशस्त होती है। जिस तरह से देश भर में विपक्षी नेता भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए एकजुट होकर माहौल बनाने की कोशिश में हैं, उसके लक्ष्य की पहली शर्त ही चुनाव में दमदार प्रदर्शन करना है। जाहिर तौर पर समाजवादी पार्टी का गढ़ उत्तर प्रदेश होने का कारण अखिलेश यादव पर इसका दबाव भी होगा।
इसके साथ ही चुनाव से पहले जहां टिकट नहीं मिलने पर असन्तुष्ट नेता दूसरी जगह सियासी ठिकाना तलाशते हैं, वहीं अपनी पार्टी को नुकसान पहुंचाने से भी पीछे नहीं रहते। इसके अलावा गठबन्धन के छोटे साथी भी ज्यादा सीटों के लिए दबाव डालते हैं। विधानसभा चुनाव में सपा से गठबन्धन करने वाले सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर नतीजों के बाद से ही अखिलेश यादव पर हमलावर बने हुए हैं। उनकी ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ किसी से छिपी नहीं है। इसी तरह राष्ट्रीय लोक दल और अपना दल कमेरावादी भी सपा से सियासी दोस्ती बनाये रखते हैं या नहीं, ये सपा प्रमुख पर काफी हद तक निर्भर होगा। इन सबके बीच बड़े भाई नेताजी के गुजरने के बाद शिवपाल यादव क्या अपनी पार्टी प्रसपा (लोहिया) को मजबूत करने के पुराने रुख पर कायम रहते हैं या भतीजे के प्रति रिश्तों की बर्फ पिघलेगी, इसका असर भी सपा के भविष्य पर पड़ेगा। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि शिवपाल कुछ समय पहले 2024 में मैनपुरी से मुलायम सिंह यादव के चुनाव नहीं लड़ने पर स्वयं उतरने की बात कह चुके हैं। अगर शिवपाल वाकई में ऐसा कदम उठाते हैं तो सपा के गढ़ में मुलायम कुनबे के आपस में ही लड़ने से पार्टी को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है।
मुलायम वर्ष 1996 में यहां से पहली बार सांसद चुने गए थे। तब से लेकर अब तक हुए नौ लोकसभा चुनावों में यहां सपा का ही परचम लहराता आया है। परिवार में आपसी फूट का भाजपा लाभ उठाने का पूरा प्रयास करेगी। इस तरह देखा जाए तो हर चुनाव अखिलेश यादव की सियासी परिपक्वता और नेतृत्व की अग्नि परीक्षा लेता नजर आएगा।
सियासी दृढ़ता दिखाने वाले मुलायम की सीखनी होगी ये कला
सबसे अहम है कि सियासी दृढ़ता से मजबूत फैसले लेने वाले मुलायम अपनों और गैरों, सभी के प्रति हमेशा मुलायम बने रहे। बेनी प्रसाद वर्मा, अमर सिंह और आजम खान जैसे उनके कई साथियों ने भले ही समय समय पर मुलायम पर जुबानी हमला किया। लेकिन, मुलायम के हमेशा शान्त बने रहने के कारण इनके रिश्ते फिर पुराने जैसे बने। मुलायम के धुर विरोधी भी उनके इस स्वभाव के मुरीद थे। दूसरे दलों के नेताओं में भी इस वजह से मुलायम का हमेशा सम्मान बना रहा। उनके निधन पर पूरे देश के नेताओं ने जिस तरह से शोक प्रकट किया, यह साफ देखा जा सकता है। अपने पिता से सियासत में माफ कर आगे बढ़ने की कला को अगर अखिलेश मुलायम बनकर अपनाते हैं, तो यह उनके और पार्टी के लिए मददगार साबित होगा।




