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रिपोर्ट बबलू सेंगर
Jalaun news today । मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के आदर्श जीवन पर आधारित श्रीरामलीला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि नगर की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर है। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती हुई नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ती आई है। जालौन नगर में इस परंपरा को स्थापित करने और निरंतर आगे बढ़ाने में नगर के तीन प्रमुख व्यक्तियों का योगदान सबसे महत्वपूर्ण रहा। उनके प्रयास से 1853 में जिस रामलीला का शुभारंभ हुआ था, वह आज भी अविरल धारा की तरह बह रही है और नगर की पहचान बन चुकी है।
सन 1853 में नगर के प्रतिष्ठित समाजसेवी सेठ चतुर्भुजदास, सेठ ताराचंद और राजगोपाल राव मलिहार ने मिलकर रामलीला महोत्सव की नींव रखी। प्रारंभिक वर्षों में लीला का मंचन चबूतरों पर होता था। उस समय नारद मोह से लेकर धनुष भंग तक की लीला का मंचन किया जाता था और यह परंपरा लगभग 15 वर्ष तक चलती रही। बाद में लोगों के बढ़ते उत्साह और सहभागिता ने इस आयोजन को और अधिक लोकप्रिय बना दिया। वर्ष 1875 में लाला कुंजबिहारी और लाला गुड़वाले के सहयोग से 21 सदस्यों की समिति गठित हुई, जिसकी अध्यक्षता हिम्मतराम राठी ने संभाली। उस दौर में रामलीला का मंचन 15 दिनों तक शुरू हुआ। आगे 1892 में इसे बढ़ाकर 23 दिनों तक किया गया। इस दौरान विभिन्न स्थलों द्वारिकाधीश मंदिर परिसर, पक्के तालाब और बाजार में अलग-अलग प्रसंगों का मंचन किया जाता था। 1901 में नगर के अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने समिति को जमीन दान की, जिसके बाद 1903 में चतुर्भुजदास ने अपने पुत्र गोकुलदास के जन्मोत्सव पर श्रीरामलीला भवन का निर्माण कराया। यहीं से रामलीला को स्थायी स्थान मिला। भवन परिसर में 1918 में दर्शकों की सुविधा के लिए चबूतरे और बैठक की व्यवस्था की गई। 1926 में 51 सदस्यीय समिति बनी, जिसमें प्रशासनिक अधिकारियों के साथ स्थानीय राजघरानों ने भी सहयोग दिया। 1932 में समिति का संविधान बनाकर पंजीकरण कराया गया। 1960 में भवन परिसर में दुकानों का निर्माण कर उनकी आय से रामलीला आयोजन का खर्च उठाया जाने लगा। 1980 के दशक में पन्नालाल गुप्ता अध्यक्ष और उमाशंकर चतुर्वेदी मंत्री चुने गए। चतुर्वेदी ने जीवन भर इस परंपरा को संभाले रखा। 2010 में अध्यक्ष बने शशिकांत द्विवेदी और बाद में मंत्री बने पवन चतुर्वेदी ने रामलीला को आधुनिक स्वरूप दिया। दशहरा मेला समिति बनाकर फौजी पड़ाव में रावण दहन व भव्य आतिशबाजी की परंपरा शुरू की गई, जो आज भी आकर्षण का केंद्र है।
रामलीला में हुआ राम कलेवा,,नगर की महिलाओं ने कराया प्रभु श्रीराम को कलेवा
जालौन। रामलीला महोत्सव-2026 में राम-कलेवा का कार्यक्रम संपन्न किया गया। जिसमें नगर की तमाम महिलाओं द्वारा प्रभु श्रीराम को कलेवा कराया गया।
एक दिन पूर्व रामलीला मंचन में प्रभु श्रीराम द्वारा सीता-स्वयंवर में धनुष-भंग किया गया था। इसके बाद अयोध्या से राजा दशरथ अपने दो पुत्रों भरत एवं शत्रुघ्न के साथ बारात लेकर मिथला आए। जहां राजा जनक ने दशरथ के अन्य तीनों पुत्रों लक्ष्मण, भरत व शत्रु़घ्न की शादी करा दी। शादी होने के बाद बुंदेली संस्कृति के अंतर्गत दूल्हा का कलेवा का कार्यक्रम किया जाता है। उसी परंपरा को बनाए रखने के लिए रामलीला समिति द्वारा दिन में राम-कलेवा का आयोजन किया गया। समिति के अध्यक्ष शशिकांत द्विवेदी, उपाध्यक्ष गिरीश गुप्ता, निर्देशक प्रयाग दुबे, मंत्री पवन चतुर्वेदी, संचालक राजकुमार मिझौना, विष्णु अग्रवाल के अलावा नगर की महिलाओं रामजानकी, सुनीता देवी, कौशल्या देवी, प्रियंका सिंह, नंदिनी देवी, आरती देवी आदि ने भी प्रभु श्रीराम को कलेवा कराकर इस कार्यक्रम में हिस्सा लिया।
जालौन। श्रीराम-केवट संवाद, दशरथ मरण व राम-भरत मिलाप की लीला का मंचन नगर के ऐतिहासिक मुरली मनोहर तालाब पर दोपहर 2 बजे से।




