रिपोर्ट बबलू सेंगर
Jalaun news today । रक्षाबंधन के दूसरे दिन जालौन नगर व ग्रामीण क्षेत्र में भुजरियों का पर्व उत्साह और उल्लास के साथ मनाया गया। घरों में बोई गई भुजरियों को सहेजकर महिलाएं देवी मंदिरों में पहुंचीं और पूजा-अर्चना के बाद गीत गाते हुए तालाबों की ओर रवाना हुईं। तालाबों पर पहुंचने के बाद महिलाओं ने विधि-विधान से भुजरियों का विसर्जन किया और ढोलक की थाप पर लोकगीत गाकर नृत्य किया। पर्व के दौरान बुंदेली संस्कृति और परंपरा की अनूठी झलक देखने को मिली।
नगर के विभिन्न मोहल्लों के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं समूह बनाकर भुजरियां लेकर निकलीं। सिर पर भुजरियों की टोकरियां और हाथों में पूजन सामग्री लिए महिलाओं की टोलियां देवी मंदिरों से होकर तालाबों तक पहुंचीं। रास्ते भर महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हुई चलती रहीं। तालाब के किनारे पहुंचकर महिलाओं ने भुजरियों का पूजन किया और उन्हें जल में विसर्जित किया। इसके बाद महिलाओं ने एक-दूसरे को भुजरियां देकर पर्व की बधाई दी और काफी देर तक नाच-गायन चलता रहा। भुजरियों का पर्व केवल उत्सव ही नहीं, बल्कि आपसी प्रेम और भाईचारे का संदेश भी देता है। शाम को पुरुष भी भुजरियां लेकर एक-दूसरे के घर पहुंचे और परिचितों को भुजरियां देकर शुभकामनाएं दीं। इस दौरान लोग एक-दूसरे से गले मिले और पुराने गिले-शिकवे भुलाकर आपसी संबंधों में मिठास घोलने का संदेश दिया। गांवों में कई स्थानों पर देर तक मेल-मिलाप और लोकगीतों का दौर चलता रहा। भुजरियों के पर्व को लेकर आल्हा खंड में भी एक रोचक प्रसंग मिलता है। मान्यता के अनुसार जब पृथ्वीराज चौहान ने महोबा को घेर लिया और उस पर चढ़ाई करने का विचार किया, तब रानी मल्हना ने अपने कुलदेवता मनिया देव से महोबा की रक्षा के लिए प्रार्थना की। तब मनिया देव ने उदल को स्वप्न में महोबा पर आए संकट की जानकारी दी और उसे महोबा की रक्षा करने के लिए कहा। इसके बाद हुए युद्ध में आल्हा और उदल ने मिलकर पृथ्वीराज चौहान की सेना के पैर उखाड़ दिए। संकट टलने के बाद उदल की बहन चंद्रावल ने भुजरियों को तालाब में विसर्जित किया था। इसी घटना से जोड़कर रक्षाबंधन के दूसरे दिन भुजरियां निकालने और उनके विसर्जन की परंपरा शुरू होने की मान्यता है। बुंदेलखंड में आज भी यह परंपरा लोगों की आस्था और लोक संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई है।










